Wednesday, August 3, 2011

स्त्री मुक्ति

प्रकृति का नियम है नर पशु मादा को आकर्षित करने की कोशिश करते हैं (ताकत के बल पर वरीयता भी प्राप्त करते हैं) और सम्बन्ध बनाते हैं ,यहाँ मादा का चुनाव भी महत्वपूर्ण है।
मनुष्य एक पशु है जाहिर है मनुष्य भी ऐसा करता रहा होगा । समय के साथ मनुष्य ने सभी पशुओ को विवेक के आधार पर पीछे छोड़ दिया।
प्रकृति के नियमो की जानकारी सबसे ज्यादा अपनी बुद्धि के बल पर मनुष्य ने ही प्राप्त की ,इसलिए आज हम इस स्थिति में जी रहे हैं।अर्थात वर्तमान में विश्व में मनुष्यों के सभी समाजो का सामाजिक परिवेश जिस तरह भी अस्तित्व में आया ,क्रमिक विकास का ही परिणाम है जो हर काल में परिस्थितियों के अनुसार बेहतर ही रहा होगा और है ।
भूमंडलीकरण के दौर मै दिक्कत वहा होती है जब हम सभी समाजों को एक ही चश्मे से देखना शुरू कर देते हैं । खासकर हम भारतीयों के साथ यह दिक्कत ज्यादा है। क्यूंकि हम हर एक चीज छलांग लगा कर प्राप्त कर रहे हैं या करने को कोशिश कर रहे हैं।
छलांग लगाने को आतुर दिख रही स्त्री की स्थिति भी कुछ इसी तरह है.
भूमंडलीकरण के दौर में भारत की सामाजिक व्यवस्था में स्त्री -पुरुष की भूमिका क्या हो इसका उत्तर संक्रमण के दौर में है ? खासकर स्त्री की भूमिका । वह वाकई यह निर्णय नहीं कर पा रही हैं की उनके लिए बेहतर क्या है ? दिल्ली में आयोजित हुआ बेशर्मी मोर्चा इसी छलांग लगाने का परिणाम है .....

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