कांग्रेस के अलावा भी लोगो को प्रधानमंत्री की छवि की चिंता क्यूँ है ?
शायद इसलिए की-
भ्रष्टाचार को पोषित करने को वह गुनाह नहीं मानते ?
ऐसा कैसे लोग विश्वास कर सकते हैं की प्रधानमंत्री और कैबिनेट को पता ही न हो ?
गर सही में घर के मुखिया को नहीं पता तो यह देश भगवान भरोसे है .
जबकि इसकी सुगबुगाहट तो बहूत पहले से हम सभी को रही है .
शायद गठबंधन धर्म को निभाते हुए उन्होंने लूटने की छूट दे रखी थी पर अंदाज़ा न था लूट इतनी बड़ी होगी .
बुधवार, 24 नवंबर 2010
सोमवार, 15 नवंबर 2010
जनसँख्या
भारत की जनसँख्या अब स्थिरीकरण को २०४५ की जगह २०७० में प्राप्त करेगी .
पिछले १० सालो में राष्ट्रीय जनसँख्या आयोग की बैठके गिनती की हुईं हैं . कुछ समय तक तो देश
को जनसँख्या एक संसाधन हे कह कर बरगलाया गया ,पर कितनी जनसँख्या ?
शनिवार, 6 नवंबर 2010
महामाया भीख योजना, उत्तर प्रदेश
महामाया भीख योजना हाल में उत्तर प्रदेश में मायावती ने शुरु की . सरकारे या कहूँ शासक वर्ग हमेशा आम जनता को आश्रित बनाकर ही क्यूँ रखना चाहती हैं .
कहने को लोकतंत्र हे पर न तो जनता न ही शासक इस मानसिकता से बाहर निकल पाए हैं अभी तक . न तो कम से कम मीडिया तो राहुल गाँधी के
सम्मान में युवराज शब्द का प्रयोग न करता.
कहने को लोकतंत्र हे पर न तो जनता न ही शासक इस मानसिकता से बाहर निकल पाए हैं अभी तक . न तो कम से कम मीडिया तो राहुल गाँधी के
सम्मान में युवराज शब्द का प्रयोग न करता.
शनिवार, 30 अक्टूबर 2010
पंचायते
गाँधी का सपना पंचायती राज व्यवस्था, साकार होते दिख रहा है उत्तर प्रदेश के चुनावो में ?
गाँधी का दार्शनिक अराजकतावाद , बदल कर वास्तविक अराजक स्तिथी में दिखाई दे रहा है ,
गाँधी-लाक जयादा सही हैं या हाब्स- नेहरु.
गाँधी का दार्शनिक अराजकतावाद , बदल कर वास्तविक अराजक स्तिथी में दिखाई दे रहा है ,
गाँधी-लाक जयादा सही हैं या हाब्स- नेहरु.
रविवार, 17 अक्टूबर 2010
गोरखपर जिंदा है क्या ?
गोरखपुर में जापानी बुखार से इस साल ५०० से अधिक बच्चे मर चुके हैं,
पिछले ३० सालो में ५००० से अधिक मर चुके और ५०००० से अधिक विकलांग हो चुके हैं ।
हमारी खुद की चुनी हुई सरकार इतनी संवेदनहीन कैसे हो सकती है?
पिछले ३० सालो में ५००० से अधिक मर चुके और ५०००० से अधिक विकलांग हो चुके हैं ।
हमारी खुद की चुनी हुई सरकार इतनी संवेदनहीन कैसे हो सकती है?
शनिवार, 17 जुलाई 2010
अंग्रेजी जानते हो क्या ?
आप अंग्रेजी जानते हैं तो सबकुछ जानते हैं नहीं तो कुछ नहीं , हमारे देश में सफलता का पैमाना यही बन गया है । निजी क्षेत्रो को छोड़िये सरकारी महकमा भी अंग्रेजी के प्रसार में लगा है । इस प्रवर्ती का प्रतिवाद करने , विरोध में तर्क देने पर जबाब आता है भैया जब सबकुछ सीख जान सकते हो तो पहले अंग्रेजी क्यूँ नहीं सीखते???????
भाषा ज्ञान प्राप्त करने का माध्यम है न कि ज्ञान । पर हमारे देश में माध्यम को ही आपके बौद्धिक विकास का मानक मान लिया गया है ।
आप एक ईमानदार, अच्छे चरित्र , तार्किक , बौद्धिक क्षमता से परिपूर्ण शिक्षित व्यक्ति हैं पर अंग्रेजी नहीं जानते हैं तो आपका अपने ही देश में कोई मूल्य नहीं।
भाषा ज्ञान प्राप्त करने का माध्यम है न कि ज्ञान । पर हमारे देश में माध्यम को ही आपके बौद्धिक विकास का मानक मान लिया गया है ।
आप एक ईमानदार, अच्छे चरित्र , तार्किक , बौद्धिक क्षमता से परिपूर्ण शिक्षित व्यक्ति हैं पर अंग्रेजी नहीं जानते हैं तो आपका अपने ही देश में कोई मूल्य नहीं।
भारतीय विदेश नीति
महाशक्ति बनने का दावा करने वाला हमारा देश पाकिस्तान के सामने लड़खड़ा जाता है ...... ???????
पिल्लई की तुलना विदेश मंत्री के सामने हाफीज़ सईद से कर दी जाती है , और मंत्रालय बचाव की मुद्रा मै है और उल्टा गृह मंत्रालय को दोष दे रहा है । जबकि इस आधार पर पाक पर दबाब डालना चाहिए था ...
पिल्लई की तुलना विदेश मंत्री के सामने हाफीज़ सईद से कर दी जाती है , और मंत्रालय बचाव की मुद्रा मै है और उल्टा गृह मंत्रालय को दोष दे रहा है । जबकि इस आधार पर पाक पर दबाब डालना चाहिए था ...
बुधवार, 14 अप्रैल 2010
दंतेवाड़ा का सच
कुछ बातें जो मै सोचता हूँ .........
नक्सली हिंसा का सख्त विरोध होना चाहिए ....... पर सरकार प्रायोजित हिंसा का भी ।
किसी एक व्यक्ति की सनक के कारण (पी चिदंबरम) पूरा समाज मुद्दे को गलत तरीके से देख रहा है।
किसी क्षेत्र को प्रशासनिक नियंत्रण में लेना एक बात है और सी आर पी फ के द्वारा काम्बिंग करना दूसरी बात।
गर हम अपने लोगो को ही ढूंड कर मारना चाहते थे तो नक्सलियो ने क्या गलत किया अपनी सोच में वो भी सही हैं , जवान पिकनिक मनाने तो वहाँ गए नहीं थे ।
सरकार की ताकत के सामने नक्सली कहीं नहीं ठहर सकते फिर भी हमारे ७६ जवान मारे गए, इससे पहले २६/११ को भी हम असहाय दिखे थे ....... क्या देश वाकई सुरक्षित है ? हमारे जवानों की जान की कीमत शायद सत्ता में बैठे लोगो के लिए कोई मायने नहीं रखती ......
नक्सली हिंसा का सख्त विरोध होना चाहिए ....... पर सरकार प्रायोजित हिंसा का भी ।
किसी एक व्यक्ति की सनक के कारण (पी चिदंबरम) पूरा समाज मुद्दे को गलत तरीके से देख रहा है।
किसी क्षेत्र को प्रशासनिक नियंत्रण में लेना एक बात है और सी आर पी फ के द्वारा काम्बिंग करना दूसरी बात।
गर हम अपने लोगो को ही ढूंड कर मारना चाहते थे तो नक्सलियो ने क्या गलत किया अपनी सोच में वो भी सही हैं , जवान पिकनिक मनाने तो वहाँ गए नहीं थे ।
सरकार की ताकत के सामने नक्सली कहीं नहीं ठहर सकते फिर भी हमारे ७६ जवान मारे गए, इससे पहले २६/११ को भी हम असहाय दिखे थे ....... क्या देश वाकई सुरक्षित है ? हमारे जवानों की जान की कीमत शायद सत्ता में बैठे लोगो के लिए कोई मायने नहीं रखती ......
रविवार, 28 फ़रवरी 2010
कविता
प्रेम को न दान दो न दो दया
प्रेम तो सदेव ही समृद्ध है
प्रेम है की ज्योति स्नेह एक है
प्रेम है की प्राण देह एक है
प्रेम है की विश्व गेह एक है
प्रेमहीन गति प्रगति विरुद्ध है
प्रेम तो सदेव ही समृद्ध है ...........
------गोपाल दास नीरज
प्रेम का त्यौहार होली आप सभी के जीवन में नई खुशिया लाये ।
प्रेम तो सदेव ही समृद्ध है
प्रेम है की ज्योति स्नेह एक है
प्रेम है की प्राण देह एक है
प्रेम है की विश्व गेह एक है
प्रेमहीन गति प्रगति विरुद्ध है
प्रेम तो सदेव ही समृद्ध है ...........
------गोपाल दास नीरज
प्रेम का त्यौहार होली आप सभी के जीवन में नई खुशिया लाये ।
बुधवार, 10 फ़रवरी 2010
खाद्यान्न उत्पादन
हमारी मुख्यमंत्री का कहना है की प्रदेश में खाद्यान्न उत्पादन दोगुना किया जायेगा । इस संदर्भ में मै सम्बंधित अधिकारियो का ध्यान भूमि व्यवस्था की और दिलाना चाहूँगा। हमारे प्रदेश में खासकर पूर्वी उत्तर प्रदेश में भूमि पर दबाब बहुत ज्यादा है । आजादी के बाद भूमि सुधारो को हम अभी तक सही तरीके से लागू नहीं कर पाए । यही नहीं जोतो का आकार विखंडित होकर कम ही होता जा रहा है । ऐसे में चकबंदी जो की भूमि सुधारो का एक महतवपूर्ण तरीका है, को एक बार फिर से अपनाये जाने की जरुरत है । जिससे किसान जो भी जोत का आकार उनके पास बचा है , पर सही तरीके और कम लागत से खेती कर सके । यही नहीं जिन लोगो ने छोटे जोत के आकार के कारन खेती करना छोड़ दिया हे वह खेती करने को प्रेरित हो सके।
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